My New Poem...!!!
यारों उभार लहूँ में जब भी आता है
या तो आँधियाँ बर्बादी की लाता है
या चैन-ओ-सुकून साथ ले जाता हैं
रक्त-दबाव-ओ-रफ़्तार भी बढ़ाता है
अच्छे-बूरें की तमीज़ भी खा जाता है
अपने-परायों की तहज़ीब भी भूलाता है
ग़ुस्से की तो सीमा ही पार कर जाता हैं
बढ़ते उभार का एहसास तो चल जाता हैं
सौ बढ़ने से पहले ही गर क़ाबू हो जाता हैं
बंदा हज़ारों तकलीफ़ों से निजात पा लेता है
बंदे को चाहिए रवानी-ए-लहूँ क़ाबू में रखें
ख़्यालों से ही इसे कमजोर कर राहत में रखें
दर-गुजर ही एक कला है बात ये ज़हन में रखें
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