कभी-कभी सोचती हूँ सबसे हिसाब कर लूँ, जाने कितने भावों को उधार लेकर बैठी हूँ। ना जाने कितना प्रेम, स्नेह वापस दे नहीं पाती। केवल लेती हूँ मैं भावनाओं को, मुझे लौटाना नहीं आता उसी हिसाब से उतना ही प्रेम, उतना ही स्नेह।
कभी सोचती हूँ बहुत दूर चली जाऊँ, जहाँ कोई नहीं हो, केवल मैं रहूँ। और इस "मैं" में अन्तर्मन ना रहे, मैं भावहीन रहूँ।
जहाँ से शून्य की खोज हुई है, वहाँ जाना चाहती हूँ। जानना है मुझको शून्य, "शून्य" होकर भी मूल्यवान क्यों है। इसलिए ही भावहीन हो शून्य होना चाहती हूँ, शायद शून्य होकर समझ सकूँ मूल्य अपना।
जानना चाहती हूँ विनाश क्या है? अंत क्या है?
जीवन का महत्व क्यों है?
कभी सोचती हूँ कि मेरी मृत्यु का शोक कितना होगा?
होगा भी या नहीं! क्या सच में दुःख होगा? या केवल नियम रहेगा सृष्टि का। आँसू मेरे ना होने पर मेरे दुःख में बहेंगे। या केवल इसलिए कि रोया जाता है शोक में।
दुःख होगा या केवल दुःखी दिखने के लिए ही दुःखी होंगे।
रोकना चाहती हूँ उस वक़्त, भागती हुई समय की घड़ी को। शायद तब देख सकूँ.. मैं कौन हूँ सभी के लिए।
घड़ी के चलते ही मेरा अंत होगा या बाकी रहूँगी अन्तर्मन में। चाहत तो यह भी है कि आ सकूँ वापस देखने, सूखी हुई आँखों में खलती मेरी कमी को भरने।
#रूपकीबातें