My Parents devaluation Poem .!!
बेशक लगा दिए उसने लाखों
रुपए मकान को महल बनाने में ...
बड़ा बदनसीब बेटा था वो जो माँ
की टूटी चारपाई न बदल सका..
लिपस्टिक लाली पावडर शोपिँग
बीबी की हर माँगा के लिए है बजट..
बूढ़े माँ-बाप के अरमानों के नाम पे
ज़रूरतों के नाम पर है जेब ख़ाली ..
वाह रे..!नीली छत वाले क्या कहने
तेरे बनाए मिट्टी के पुतले है निरालें..
उम्र-भर जिस्म जिसमें रगड़ सींचा है
पौधा उसी पेड़ की आज सामंत आई हैं..
सुखें पत्ते-सा हाल है उस ऑचलका
जिसने दूध की धारा कभी पिलाई है..
और कल की कलमुई तो आज जान से
ज़्यादा जागीर व जिगर बनी नपुंसक की
“रुँह” तो उस प्रभु की भी काँपती होगी
जिसने इन ना-मर्द-से शैतान बनाए होंगे।
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