My New Poem ....!!!!
अदब भूल गए हैं,
शायद अब ख़्याल तेरे,
बिना दस्तक दिए ही,
चले आते हैं ज़हन में...!
सुबहा की पहली-सी,
किरन पर सवार डोलीसे
दाखिल होते है ज़हन में..!
ज़हन से दस्तक देते हूए
दिल की खिड़कियों से
गूजर कर उतरते पन्नों में..!
अजीब रुझान है दिवाने का
प्रभु-स्मरण करते ही छलक
ही जाते हैं लहजे किताबों में..!
यह उसका करम-औ-इनायत
जो रखें ख़्याल-औ-अहसास
प्रभुने मेरे अपनी ही पाकीज़गी में..!
जीते जी ही पा ली शायद मंज़िल
वरना हर सुबह इतनी आसानी से
कलाम शायरा ना बनते ज़हन में..!
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