वो मुझको को आजमाना चाहती है
उन्नीस या बीस मेरी
एहमियत जानना चाहती है
भीड़ में रह कर,नज़र मैरी
सिर्फ अपनी ओर चाहती है
जब कभी रहु तन्हाइयों में
खुद के ही ख्याल मे रहे ये चाहती है
ग़म हो चाहे खुशी की बहार
उसमें शामिल होना चाहती है
हर कदम साथ चाहे मेरा
वो सफर तय करना चाहती है
उसके हर लफ्ज़ ने हर पन्ने ने
मुझे ही पहचानता है
मैरी भी किताब का हर लफ्ज़
हर एहसास होना चाहती है...
एक तमन्ना