My New Poem ...!!!
चलो.. हंसने की कोई
वजह ढुंढते है
जिधर न हो कोई गम
वो जगह ढुंढते है
बहुत उड़ लिए ऊंचे आसमानों
में यारों अब तक
चलो जमीं पर ही कहीं
सतह ढुंढते है
छूटा संग कितनों का जिंदगी
की हँसी जंग में
चलो उनके दिलों की हम
गिरह ढुंढते है
बहुत वक़्त गुजरा भटकते
हुए अंधेरों में
चलो अंधेरी रातके बाद की
सुबह ढुंढते है
भटकते भटकते आ गए बियाँ-बान
ख़्यालों के भँवर में
आऔ “रुँहो” की परवाज़ों से उड़
प्रभु-शरण ढुंढते है..!!
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