आत्महत्या
नहीं ये अचानक नहीं होता। ये एक दिन की बात नहीं है। इसकी शुरुआत तो बहुत पहले हो जाती है। बस कोई समझ नहीं पाता। अचानक आए बदलाव को जब कोई गम्भीरता से नहीं लेता। जब मन की बातें और दुविधाएं कोई सुनना नहीं चाहता। टूटे दिल और टूटे सपनों के टुकड़े कोई समेटने नहीं आता।
तब होती है शुरुआत..
ये एक दिन का निर्णय नहीं है, एक दिन की तक़लीफ नहीं है, एक दिन का दुःख नहीं है। ये तो परिणाम है मटके के भर जाने का। जब मटके रूपी जीवन को, दुःख और तनाव के कंकड़ भरते जाते हैं तो वह फूट जाता है। बिखर जाता है। समाप्त हो जाता है।
बहुत हिम्मत की थी उसने खुद को समेटने की मगर सहारे की ज़रूरत थी कंकड़ को निकालने के लिए। मगर वक़्त नहीं था किसी के पास, सब व्यस्त थे। धैर्य नहीं था बहते आंसुओ के सूखने पर बिगड़ी बातों को सुनने का।
परिणाम, उसने हिम्मत जुटा कर एक आसान रास्ते पर निकलना चाहा, और स्वयं का अंत कर लिया।
ये इतना आसान नहीं है, मगर चुपचाप सहने और बेबसी से आसान था। आसान था हर परिस्थिति से बचने के लिए।
बहुत आसान था सब कुछ आसान करने के लिए।
#रूपकीबातें