उसूल - लघुकथा -------
"क्या बात है सर, आज पहली बार आपको व्हिस्की लेते देख रहा हूँ?"
"हाँ घोष बाबू, आज मैं भी कई साल बाद तनाव मुक्त महसूस कर रहा हूँ।"
"मगर सर मैंने आपको कभी हार्ड ड्रिंक लेते नहीं देखा।"
"आप सही कह रहे हैं। मैंने जिस दिन यह कुर्सी संभाली थी, अपने पिता को वचन दिया था कि मैं सेवा निवृत होने तक ड्रिंक नहीं करूंगा। आज रिटायर होने के साथ ही उस बंधन से मुक्त हो गया।"
"लेकिन सर, खैर छोड़िये...........?"
"क्यूँ छोड़िये, आज सब बंधन तोड़ दो। जो भी मन में है बोल दो।"
"सर आप बुरा मान जायेंगे।"
"पिछले सालों में इतना सुनने और सहने की आदत हो गयी है कि अब कुछ बुरा नहीं लगता।"
"आप सही कह रहे हैं।पर मेरा मन आपकी आत्मा को दुखाना नहीं चाहता।"
"दिल खोल कर पूछो, अब उन सारी परिस्थितियों को पार कर चुका हूँ।और वैसे भी तुम तो अपने ही हो।"
"सर मुझे आपके पिछले दिनों लिये गये निर्णयों पर हैरत हो रही है।ये फ़ैसले आपकी विचारधारा, उसूल और चरित्र से मेल नहीं खाते।"
"घोष बाबू, धारा के विरुद्ध तैरने के लिये जिस शारीरिक शक्ति और मानसिक क्षमता की आवश्यकता होती है।वह अब मुझमें नहीं बची।"
"कहीं ऐसा तो नहीं कि आप समझौतावादी विचारधारा को स्वीकार कर लिये।"
"सेवा निवृति के बाद के भविष्य की चिंता तो सभी को होती है।"
मौलिक - लघुकथा -