देखा था एक नजारा ,
जो आता है याद मुझे आज सारा l
दुनिया की भीड़ में ,घूम रहे थे हम कहीं ,
फस गए सिग्नल में आकर यही l
बांट रही थी भली
मिठाई के डिब्बे जरूरतमंदों को वही l
पर रह गई एक बुढ़िया वहीं खड़ी की खड़ी
ना हाथ में आया डिब्बा ,
पर आंखें भर गई आंखों से वही l
मैं चुपचाप देख रही थी यह सब सिग्नल पर खड़ी ,
आंखें मेरी भी थी आंसुओं से भरी
कि क्यों ना मैं उसको खिला दूं ,
वहां सिग्नल पर खड़ी l
पर उस वक्त आया एक चौकीदार वही
उसने उस बुढ़िया को बिठाया
और अपने डिब्बे से एक निवाला उसे खिलाया l
ऐसे आधा-आधा डिब्बा दोनों ने खाया
एक बन गया मांझी , एक बन गया पतवार l
यह कहानी सच है मेरे यार
खड़ी थी मैं सिग्नल पे खड़ी
एक आदमी का एक दूसरे के प्रति प्यार l