देव दीवाली की पूर्णिमा
ए चांद, आज तुझे देखते ही चढ़ रहा है मुझे मदहोशी का नशा
पुर बहार में है तु, और समुंदर के ऊपर, बादलों में है जा बसा;
बड़ा खूबसूरत लगा तु, बादल की ओट से जब तु हसा
बनाया है तुने आज बड़ा ही दिलकश और नशीला नज़ारा;
खुले नील गगन में आज मुझे नहीं दिखता है, एक भी सीतारा ।
यहां से लगता है तु बड़ा तेजोमय, खूबसूरत, और प्यारा ;
तेरी कला बनाती है इस जग को एक अति सुंदर खेला ।
पर पुछु तुझे, " क्या तु भी मेरी तरह है उदास और अकेला" ?
पिया बिना हूं मै उदास; भले जग है लोगो से भरा एक मेला ।
चांदनी से तेरी, करते रहना इस धरा को सुंदर और शीतल
तेरी चांदनी से खिलते रहे यहां सुंदर सुगंधित कमल
मिलता रहे हमें तेरा नज़ारा और शीतलता का फल ।
सदा करना तु प्रेमीओका जीवन मधुर और सफल
Armin Dutia Motashaw