रातों के अंधेरे ने जो पूछे
उन सवालों के जवाब तलाशते हुए
एक रोज़ घर की चौखट लाँघ देना
फिर कभी ना लौट आने को
ज़िम्मेदारियों के बोझ तले
ना कुचल दिए जाने को
बेबस हो कर खुद पर
फिर कभी तरस ना खाने को
सारे तानों को भुला कर
खुद को और रुला कर
सिसकियों में डूब कर मरती
जवानी को बचाने को
बचपन को मिटाने को
रिश्तों को भुलाने को
एक रोज़ मैं निकल जाना चाहता हूँ
हमेशा के लिए खुदगर्ज़ हो जाने को।