इत्तेफ़ाकन कभी जब मै छत पर लेटा, युही तारे देखता हूँ
और तुम होती हो मेरे साथ मेरे तसव्वुर में
जब मेरे खयालो में हम लिपटे होते है दोनों
मेरा हाथ खींच कर कहती हो तुम
"चलो घूमने चले कही!"
मै थका हारा दिन भर का जब कहूं तुमसे, हिम्मत नहीं है
तुम मुंह फुला कर बैठ जाती हो!
खींच लेता हूँ मै तुम्हे, छाती को अपनी
"बोलो कहा चलना है?" कानों में कहता हूँ तुम्हारे!
फुसले हुए किसी बच्चे की तरह चाँद की तरफ उंगली बढाती हो
और कहती हो वहां... वहाँ जाना है!
तुम्हारी ज़िद्द पर जब मै ले चलता हूँ तुम्हे उस पीले चाँद के टीले तक
कुछ वक़्त को रुक कर वहा
ज्यो ही यू-टर्न लेने लगता हूँ, तुम फिर मुंह सिकोड़ लेती हो
और उंगली दिखा कर ‘ज्यूपिटर’ की ओर सर नीचे कर लेती हो
तुम्हारी मासूमियत से हारा मै
फिर चल देता हू इक और लम्बे सफ़र में
बिना वक़्त की परवाह किये
और लम्बी इस चहलकदमी के बाद
वापस अपने इस सय्यारे पर सो जाते है इक थकी नींद में
खामोश गहरी इक नींद में
नींद से उठ कर तुम्हे ढूँढू सुबह तो
तुम हकीकत में कही भी नहीं, तुम्हारा बिस्तर भी कही नहीं
पर पता है मुझे शाम को आऊंगा आज जब मै छत पर अकेले
‘प्लूटो’ की और उंगली दिखा कर तुम कहोगी
"चलो घूमने चले कहीं!"