तुम्हारी आँखों की गिरफ़्त में
कैद हूँ, ज़िंदा भी हूँ अब तक ....
सांसें ऊबी हुई है ज़िंदगी से
रफ़्ता रफ़्ता जी रहा हूँ....
ये कहना अब बेमानी होगा कि
मेरी सांसें चल रही है तुम्हारे लिए....
तुम्हारी आँखें अब भी रसद जुटाती है
मेरी टूटती सांसों के लिए ......
काश! तुम्हारी आँखें बेज़ुबाँ होती
समझ न पाता उन ख़ामोश लफ़्ज़ों को.....
शायद आरज़ू ही न होती
लड़खड़ाती सांसों पर काबू पाने की.....
बस, इतनी सी इजाज़त दे दो कि
तुमसे नज़रें मिलाते हुए धड़कन मेरी ठहर जाये..