अकेलापन ही पूर्ण करता है मुझे ,
भीड़ में तो
बस वो शरीर चलता है ,
हाँ मै वो हूँ
जो रोज़ जीता है
एक मौत
रोज़ जीता है
एक नाक़ाम खवाइश
रोज़ जीता एक प्रेम
रोज़ जीता है
एक नफ़रत
रोज़ जीता है
एक विरोधाभास
जिसकी हर परिभाषा
बस एक बात कहती है
तू ज़िंदा है ,
इसलिए इतना सोचता है
सोच न मेरे दोस्त
किसने तुझे रोका है
सोच और जी
अपने अकेलेपन को
वहाँ भी कौन तुझे टोकता है ,
इस अकेलेपन की
कोठरी से ही होकर
रास्ता दुनियां का खुलता है।
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