अंदर की बात - लघुकथा -
"बड़े भैया आपसे एक विनती करनी है।" छोटे ने दोनों हाथ जोड़ कर बड़े भाई से डरते डरते निवेदन किया|
"अबे ऐसे क्यों गिड़गिड़ा रहा है? तू हमारा छोटा भाई है। बेधड़क बोल क्या बात है?"
"भाई साहब, लगभग दो ढाई साल से अधिक हो गया, माँ बाबूजी को मेरे पास रहते हुए। अब उन्हें आप ले जाते तो अच्छा रहता।"
"क्यों क्या हुआ अचानक? तुझे कोई समस्या हो रही है क्या?"
"भाई साहब , आजकल मेरा बज़ट गड़बड़ा रहा है।"
"कैसी बेसिरपैर की बात करता है? दो प्राणी, वे भी सत्तर पार। कितना खर्चा होता है उनकी दाल रोटी में? मुझसे ले लिया कर।"
"भाई साहब, बात दाल रोटी के खर्चे की नहीं है।"
"तो फिर क्या समस्या है? खुलकर क्यों नहीं बोलता?"
"आप तो ठहरे जिले के बड़े सरकारी अधिकारी। मैं एक प्राइवेट कंपनी में मामूली सा मुलाज़िम। आपके पास रहने से उनका इलाज़ मुफ़्त होता रहेगा। मुझे हर महीने हज़ारों रुपये प्राइवेट अस्पतालों में इनकी दवाओं पर खर्च करने पड़ते हैं।"
"यह कोई बड़ी समस्या नहीं है। तू उनके मैडीकल बिल मुझे भेज दिया कर। मैं उनको रिएंम्बर्स करा कर तुझे पैसे भेज दिया करूँगा।"
"भाई साहब, इतना बखेड़ा खड़ा करने से तो अच्छा होगा कि आप उन्हें अपने पास ही रख लेते।"
"अबे यार छोटे, तू समझता क्यों नहीं है? उनको मेरे पास रखने में मुझे बहुत बड़ी स्टेटस प्रॉब्लम फेस करनी पड़ती है।"
मौलिक लघुकथा