जादू
छुआ नहीं तन को कभी,
छु लिया सीधे रूह को मेरे;
रातों को कभी सोने नहीं दिया मुझे, इस प्यार ने तेरे
ऐसे प्यार को क्या नाम दूं; जो छा जाए पूरे दिल में ;
खयालों में तु, सपनों में तु; तु ही है तन मन में
आहट होती है तो सोचू तु आया; धुंदे तुझे हरदम यह नज़र
प्रीतम मेरे, तु ही बता यह कैसा है प्यार का अनोखा मंज़र
दिल बेचैन, रूह बेचैन; बेचैन निगाहें मेरी;
हो गई है निराश, राह निहारते निहारते तेरी ।
मन जानता है आओगे न तुम कभी, पर दिल मानता ही नहीं;
क्या करू इस दिल का, जो सच्चाई समझता ही नहीं।
यह कैसा जादू किया तुने प्रीतम, मै रही न खुद अपनी;
पर मै क्या; न राधा प्यारी, न मीरा रानी हो सकी तेरी पत्नी
Armin Dutia Motashaw