संबंधों के संसार में बदलाव
व्यक्ति दो या दो से अधिक, अधिकतम व्यक्तियों के साथ प्रभावशाली व्यक्तित्व के रूप में जीवन जीने का लक्ष्य लेकर चलता है और अपने संबंधों को व्यक्तिगत,रीति-रिवाज और वंशागत रूप से निभाता या निभाने का प्रयास करता है। इन संबंधों के संसार में समयाभाव, स्वार्थ, आवश्यकताओं की आपूर्ति का अभाव और मेरा स्वयं का स्वभाव *संबंधों के संसार में बदलाव* का महत्वपूर्ण कारक तत्व है ।
संबंधों के संसार में अणु से अंत तक हम मां की ही देन है। मै माँ के सीने के स्पर्श से अलग होते ही खूब रोया था, उसे पहचाना,जाना, हर केंद्र में मां के सिवा कोई नहीं था, शनै:शनै: बड़ा होता गया संबंध बने, बनाये, बनते गए।भाई-बहन दोस्त, प्रेम, विवाह, संतान, परिचय आदि सभी के साथ मैं आवश्कताओ के अधीन बदलता गया। मेरे *संबंधों के संसार में बदलाव* आता गया। अकाट्य सत्य यही है कि सभी संबंधो मे बदलाव समय के अधीन है। संबंधों का शिखर पर सदैव स्थिर रहना संभव है ही नहीं। संबंधों का संसार असार है। साधना ही सत्यम, शिवम, सुंदरम का सार है। आत्म कल्याण का हेतू और मोक्ष का द्वार है।
तेजकरण जैन
राजनांदगाँव
छतीसगढ