मैं कश्मीर, मैं अपनी कहानी कैसे किसे सुनाऊँ?
हर दीपक बारूद भरा है ज्योति कैसे जलाऊँ?
रोऊँ या फिर कसकूं मैं या चुप रह ये सब देखूं?
कोई नहीं है यहाँ पराया तोहमत किसपर फेंकूं?
कभी थे गुलशन चौराहे और महकती वादियाँ |
पेड़ भी खुश से रहते थे और सुखीं आबादियां |
अब मंज़र भी वीरान पड़े हैं चेहरों पर वीरानी है |
कभी तो झेलम में होता था अब आँखों में पानी है |
हर कोई बना बारूद कि पाऊँ चिंगारी और फट जाऊं |
हर हाथ है तेज़ धार सा पैना , हाथ लगाऊं कट जाऊं |
कब तक मैं यूँ सिमट रहूँ किस देश भला मैं जाऊं |
हर दीपक बारूद भरा है ज्योति कैसे जलाऊँ?