मिलकर युं ही बीछडती है परछांईयाँ फकत,,
ना मिला कोई , नूर ए अलम आईना बनकर ;
आरपार देखलुं नजारा, ओर नजर का हुनर ,
ईश्क हकीकी ,मिला ना कोई रुहाना बनकर;
दर्द ओर जख्म की परवाह , कहाँ है दिल को ,
मरहमी अंदाज मैं जीता हुँ दिल ए नूर बनकर;
रास्ते अजीब से ,चले आ रहे मेरी तरफ यारों ,
मैं मिलना चाहता बस, रुहानी मंजिल बनकर;
आनंद से जीना है, हकीकतमें यार हकीकी मे,
तकदीर से मिले कोई रहेनुमा फरिस्ता बनकर;