समय की धारा
समय की धारा, सदियों से बस बहती जाए;
न धीमी, न तेज, बस एक धार बहती जाए ।
वक्त की नदी, जो एक धारा, बहती जाए ;
मानव के हिसाब के सुख दुख उसे देती जाए।
मानव न उसे रोक सके, न थाम सके;
न वोह उसे मोड़ सके, न अंजाम दे सके ;
समय की धारा, न किसी के लिए रुकी है ,
न वोह कभी किसी के लिए रुकेगी ।
पर मन चाहता है सुख की धारा लंबी बहे
और दुख की नदी, जल्द से जल्द, चलती बने ।
उमर कटती रहे, घटती रहे, पर समय की धारा;
यह नदी सदा बहती रहे, मुड़के आए न दुबारा ।
इसी लिए, तु, हे मानव, समय के साथ;
बहना सीख, चला अपने पांव और हाथ।
समय होता है बड़ा किम्मती, जैसे एक मोती
हे मानव, जल्द से जल्द जला ले मनमंदिर में ज्योति ।
Armin Dutia Motashaw