एक कोशिश..
न पीने की चाहत है जाम कोई
चाहत है इश्क की तश्नगी मेरी।
खुलूस है मोहब्बत उनकी देखो
बस मौत बन गई पसंदगी मेरी।
रेख्ता है निगाहों में ख्वाब उनके
वो बन गई है जैसे जिंदगी मेरी।
मौजूं भी मालूम नहीं वफा का
बन गई है फरावाँ बंदगी मेरी।
नाकर्दकार बन गया हूँ जमाने में
दिव्या रास न आई सादगी मेरी।
दिव्या राकेश शर्मा।