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क्या आप जानते हैं कि चिलचिलाती धूप में बूंद-बूंद पानी के लिए तड़पते बेजुबानों को अनदेखा करना हमारी इंसानियत पर कितना बड़ा सवाल है? हमारे वेदों के परम ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ सिद्धांत और गरुड़ व स्कंद पुराण के उन पवित्र सत्यों को उजागर करता यह लेख, सीधे आपकी चेतना को झकझोर देगा कि क्यों हमारे पूर्वजों ने ‘भूत यज्ञ’ को हर गृहस्थ के लिए एक अनिवार्य कर्तव्य बनाया था। यह सिर्फ एक लेख नहीं, बल्कि भीषण गर्मी में दम तोड़ते मूक प्राणियों की मर्मस्पर्शी पुकार और साक्षात ईश्वर की सेवा का वह दिव्य मार्ग है जिससे हर मनुष्य को जुड़ना चाहिए। चिलचिलाती धूप के इस दौर में आपका एक छोटा सा संवेदनशील प्रयास कैसे किसी बेजुबान के लिए जीवनदान और आपके जीवन के लिए अक्षय पुण्य का वरदान बन सकता है, यह जानने के लिए इस विशेष प्रस्तुति को पूरा पढ़ें और बेजुबानों के मददगार बनें। https://www.matrubharti.com/book/19992956/n-a
क्या आप भी दूसरों के व्यवहार से दुखी हैं? जानिए दादा भगवान का जादुई समाधान!" “अक्सर हम दूसरों को अपनी तकलीफों का जिम्मेदार मानते हैं, लेकिन जब नज़रिया बदलता है, तो जीवन बदल जाता है। दादा भगवान के विज्ञान से मिली इस अनमोल समझ को पढ़ें और साझा करें। 🙏✨” “क्या कभी आपको ऐसा लगा है कि आपकी शांति की चाबी दूसरों के हाथों में है? कोई कुछ कह देता है और आप घंटों परेशान रहते हैं?” अक्सर हम अपनी तकलीफों का दोष दूसरों को देते हैं, लेकिन दादा भगवान के ‘अक्रम विज्ञान’ ने मुझे एक ऐसी समझ दी है जिसने मेरे जीने का अंदाज़ा ही बदल दिया। कैसे हमारा अपना ‘कर्म’ और सामने वाला ‘निमित्त’ मिलकर काम करते हैं? कैसे एक छोटी सी प्रार्थना और माफी हमारे भारी से भारी कर्म को हल्का कर सकती है? अपनी शांति वापस पाने और रिश्तों को एक नई गहराई देने के लिए, इस लेख को अंत तक ज़रूर पढ़ें। यह आपकी सोच और आपके जीवन, दोनों को बदल सकता है। 👇 अक्सर जब कोई हमें दुःख देता है या हम पर बिना वजह चिल्लाता है, तो हमारा मन कहता है— “गलती उसकी है, वह कितना बुरा है।” लेकिन क्या वाकई ऐसा है? आध्यात्मिक विज्ञान (अक्रम विज्ञान) के अनुसार, जीवन के कठिन प्रसंगों को सुलझाने की एक अद्भुत चाबी मिली है, जो मैं आप सभी के साथ साझा करना चाहती हूँ। 1. सामने वाला कौन है? हमें लगता है कि सामने वाला व्यक्ति हमें दुःख दे रहा है, लेकिन हकीकत में वह सिर्फ एक ‘निमित्त’ (Postman) है। मेरे ही किसी पुराने कर्म का हिसाब चुकता करने के लिए कुदरत ने उसे एक साधन बनाया है। दादा भगवान कहते हैं— “भुगते उसकी भूल।” यानी जो आज दुःख भोग रहा है, गलती (हिसाब) उसी की है। जैसे ही हम सामने वाले को निर्दोष देखते हैं, हमारा आधा बोझ उतर जाता है। २. बाहर से कड़क, अंदर से नर्म अक्सर लोग पूछते हैं— “अगर हम सबको निर्दोष देखकर माफ करेंगे, तो लोग हमारा फायदा उठाएंगे।” यहाँ समझ की ज़रूरत है। हमें अंदर से सामने वाले को निर्दोष मानना है ताकि हमारा द्वेष खत्म हो, लेकिन बाहर से व्यवहार में हम ‘कड़क’ हो सकते हैं। जैसे एक माँ बच्चे को सुधारने के लिए नाटक की तरह कड़क होती है, वैसे ही हम अपनी सीमाएं तय कर सकते हैं, पर मन में कड़वाहट रखे बिना। ३. प्रार्थना और जागृति का जादू रोजाना की एक छोटी सी प्रार्थना हमारे जीवन की दिशा बदल सकती है: “हे अंतर्यामी परमात्मा! मुझसे मन, वचन, काया से किसी भी जीव को किंचित मात्र भी दुःख न हो, ऐसी मुझे शक्ति दीजिए।” यह प्रार्थना हमारे भविष्य के नए कर्मों को बांधने से रोकती है। भले ही पुराना स्वभाव (गुस्सा) कभी-कभी बाहर आ जाए, लेकिन अगर हम तुरंत जान लेते हैं कि “यह गलत हुआ”, तो हमारी जागृति शुरू हो जाती है। ४. अपनी भूलों की सफाई (प्रतिक्रमण) जब भी हमसे कोई गलती हो या मन में किसी के प्रति बुरे विचार आएं, तो तुरंत मन ही मन माफ़ी मांग लें: “मैं आपके भीतर बैठे शुद्धात्मा से क्षमा मांगता हूँ, मुझसे गलती हो गई, ऐसा नहीं होना चाहिए।” जब हम अपनी गलती का पक्ष लेना छोड़ देते हैं और दोबारा न करने का निश्चय करते हैं, तो कर्म की जड़ कट जाती है। निष्कर्ष: बदला लेने से हिसाब बढ़ता है, और माफ़ करने (प्रतिक्रमण) से हिसाब चुकता होता है। अपनी सोच बदलें, जीवन अपने आप शांत हो जाएगा। यह मेरी अपनी समझ है जो मैंने आध्यात्मिक चर्चा के माध्यम से सीखी, उम्मीद है यह आपके भी काम आ
लक्ष्मी किस हिसाब से मिलती है? लोग संतति और संपत्ति के पीछे क्यों भागते हैं? क्या क्रिप्टो करन्सी में पैसे रोकना ठीक है? लक्ष्मी के नियम के बारे में अधिक जानने के लिए ज़रूर सुनें यह पॉडकास्ट। On what basis does one get money? Why do people run after progeny and property? Is it okay to invest money in crypto currency? Tune into this podcast to learn more about the rules of money.
दादा भगवान फाउंडेशन की शोर्ट फिल्म “ट्रुथ और डेयर” भगवान श्री कृष्ण की नैमितिक कर्ता की बात को हँसते खेलते परिवार के साथ ट्रुथ और डेयर गेम के माध्यम से परोसती है। कोई काम ख़ुद से सफल होता है तब इन्सान ख़ुद से या ख़ुद की काबिलियत से हुआ ऐसा मानता है। और जब कड़ी मेहनत के बावजूद कोई काम निष्फल होता है तब इन्सान दूसरों को या संजोग को ज़िम्मेदार मानता है। तो चलिए जानते हैं, इस जगत के सच्चे कर्ता का रहस्य इस शोर्ट फिल्म में...
अभिप्राय दादा भगवान के अनुसार अभिप्राय हमारे भीतर की वह सूक्ष्म राय या धारणा है जो किसी भी व्यक्ति, वस्तु या परिस्थिति के बारे में हमारे मन में घर कर जाती है। यह अहंकार का ही एक रूप है जहाँ हम अपनी बुद्धि के आधार पर किसी को हमेशा के लिए एक सांचे में ढाल देते हैं। जब हम कहते हैं कि 'यह व्यक्ति बहुत बुरा है' या 'वह तो सुधर ही नहीं सकता', तो यह हमारे मन में उस व्यक्ति के प्रति एक गहरी गांठ बना देता है। यह धारणा इतनी मजबूत होती है कि अगर भविष्य में वह व्यक्ति अच्छा व्यवहार भी करे, तो भी हमारा पुराना अभिप्राय हमें उसकी अच्छाई देखने नहीं देता।अध्यात्म की दृष्टि से अभिप्राय को कर्म बंधन का सबसे मुख्य कारण माना गया है क्योंकि यह राग और द्वेष को जन्म देता है। जब हम किसी के प्रति अच्छा अभिप्राय रखते हैं तो राग पैदा होता है और जब बुरा अभिप्राय रखते हैं तो द्वेष पैदा होता है। दादा भगवान कहते हैं कि असली मुक्ति तभी संभव है जब हमारे भीतर से ये राय या ओपिनियन खत्म हो जाएं। हम किसी की गलती को देख तो सकते हैं, लेकिन उसे उस गलती के साथ 'लेबल' नहीं करना चाहिए। अभिप्राय एक ऐसी अदालत की तरह है जहाँ हम खुद ही जज बनकर दूसरों को सजा सुना देते हैं, जबकि असल में हर व्यक्ति अपनी प्रकृति और पिछले कर्मों के अधीन होकर व्यवहार कर रहा होता है।इस सूक्ष्म बंधन से छूटने का रास्ता यह है कि हम सामने वाले को 'शुद्धात्मा' के रूप में देखें और उसकी गलतियों को उसकी प्रकृति का हिस्सा मानकर उसे माफ करें। जैसे ही हम किसी के प्रति अपना अभिप्राय तोड़ देते हैं, हमारे मन की वह गांठ खुल जाती है और हम आंतरिक शांति का अनुभव करते हैं। यह प्रक्रिया किसी को बदलने की नहीं, बल्कि खुद के देखने के नजरिए को साफ करने की है ताकि हम किसी भी पूर्वाग्रह के बिना वर्तमान क्षण में जी सकें। प्रतिक्रमण एक ऐसी आध्यात्मिक प्रक्रिया है जो अभिप्राय की जड़ को ही जला देती है। दादा भगवान समझाते हैं कि अभिप्राय असल में मन के भीतर लगा हुआ एक 'दाग' है, और प्रतिक्रमण उसे धोने का साबुन है। जब हम किसी के प्रति कोई राय बनाते हैं, तो वह एक सूक्ष्म बीज की तरह हमारे भीतर रोपित हो जाता है, लेकिन जैसे ही हम सजग होकर पश्चाताप करते हैं, वह बीज अंकुरित होने से पहले ही भस्म हो जाता है।जब आप किसी व्यक्ति के दोष देखते हैं या उसके प्रति मन में कोई पक्की धारणा बना लेते हैं, तो उसी समय अपने भीतर विराजमान 'शुद्धात्मा' को साक्षी रखकर उस व्यक्ति की शुद्धात्मा से माफी मांगनी चाहिए। यह माफी बाहर बोलकर नहीं, बल्कि भीतर ही भीतर मांगनी होती है। इस प्रक्रिया में तीन चरण काम करते हैं: सबसे पहले अपनी गलती को स्वीकार करना कि 'मैंने बुरा अभिप्राय रखा', फिर उस गलती के लिए सच्चे हृदय से पछताना, और अंत में यह दृढ़ निश्चय करना कि 'मैं अब ऐसा अभिप्राय दोबारा नहीं रखूँगा'।जैसे-जैसे आप बार-बार प्रतिक्रमण करते हैं, उस व्यक्ति के प्रति आपके मन में बनी हुई पुरानी 'गांठ' ढीली होने लगती है। प्रतिक्रमण करने से आपके भीतर का वह परमाणु बदल जाता है जो द्वेष या राग पैदा कर रहा था। दादा भगवान कहते हैं कि यदि आप किसी के प्रति बहुत गहरे अभिप्राय से भरे हुए हैं, तो उसके लिए शांति से बैठकर ५-१० मिनट तक 'हार्टी' प्रतिक्रमण करें। ऐसा करने से न केवल आपका मन हल्का होगा, बल्कि आश्चर्यजनक रूप से सामने वाले व्यक्ति के स्पंदन (vibrations) भी आपके प्रति बदलने लगेंगे।अभिप्राय से मुक्ति का अर्थ यह नहीं है कि आपको कुछ दिखाई नहीं देगा, बल्कि इसका अर्थ यह है कि अब आपके पास किसी को 'लेवल' करने की फुर्सत नहीं होगी। आप सामने वाले की गलती को देखेंगे तो सही, पर उसे 'गलत इंसान' नहीं मानेंगे। प्रतिक्रमण वह हथियार है जो आपको 'जज' की कुर्सी से उतारकर एक 'शुद्ध दृष्टा' बना देता है, जिससे आप कर्मों के भारी बोझ से मुक्त होकर आत्मिक आनंद की ओर बढ़ पाते हैं
फाइलों का समभाव से निकाल। किसी स्थिति को संभालने के दो तरीके हैं - या तो हम उस पर प्रतिक्रिया दें या हम उसे सोल्व करें। हम जिस तरह से परिस्तिथि का सामना करते हैं, उससे उसके आगे के परिणाम तय होते हैं । जिस तरह से हम पारिस्थित को सँभालते हैं, उससे या तो दूसरों के साथ हमारा रिश्ता बन सकता है या टूट सकता है। क्या किसी स्थिति में स्वयं को और दूसरों को कष्ट पहुंचाने से बचने का कोई तरीका है? इसके बारे में अधिक जानने के लिए इस वीडियो को देखना न भूलें।
प्रश्नकर्ता: मनुष्य का ध्येय क्या होना चाहिए? दादाश्री: मोक्ष में जाने का ही! यही ध्येय होना चाहिए। आपको भी मोक्ष में ही जाना है न? कब तक भटकना है? अनंत जन्मों से भटक भटक... भटकने में कुछ बाकी ही नहीं रखा है न! तिर्यंच (जानवर) गति में, मनुष्यगति में, देवगति में, सभी जगह भटकता ही रहा है। क्यों भटकना पड़ा? क्योंकि ‘मैं कौन हूँ,’ इतना ही नहीं जाना। खुद के स्वरूप को ही नहीं पहचाना। खुद के स्वरूप को जानना चाहिए। ‘खुद कौन है’ वह नहीं जानना चाहिए? इतना घूमे फिर भी नहीं जाना आपने? सिर्फ पैसे कमाने के पीछे पड़े हो? मोक्ष के लिए भी थोड़ा-बहुत करना चाहिए या नहीं करना चाहिए? प्रश्नकर्ता: करना चाहिए। दादाश्री: अर्थात स्वतंत्र होने की ज़रूरत है न? ऐसे परवश कब तक रहना है? प्रश्नकर्ता: मैं ऐसा मानता हूँ कि स्वतंत्र होने की ज़रूरत नहीं है, लेकिन स्वतंत्र होने की समझ की ज़रूरत है। दादाश्री: हाँ, उस समझ की ही ज़रूरत है। उस समझ को हम जान लें तो बहुत हो गया, भले ही स्वतंत्र नहीं हो पाएँ। स्वतंत्र हो पाएँ या न भी हो पाएँ, वह बाद की बात है। फिर भी उस समझ की ज़रूरत तो है न? पहले समझ प्राप्त हो गई, तो बहुत हो गया। उपरोक्त संदर्भित माहिती: पुस्तक : मैं कौन हूँ? (पृष्ठ क्रमांक #२० परिच्छेद द्वितीय) #DadaBhagwan #SelfRealization #AkramVignan #Shuddhatma #GnanVidhi #DadaBhagwanFoundation https://youtu.be/Hu8LzlxHt0M?si=HBZOF7uNXUEYWTRn
भाव कर्म? “पैसों से ही 'ऑब्लाइज़' किया जा सके, ऐसा नहीं है। वह तो देने वाले की शक्ति पर आधारित है। सिर्फ मन में भाव रखने हैं कि, 'कैसे मैं ऑब्लाइज़ करूँ', इतना ही रहा करे, बस वही देखना है।”: परम पूज्य दादा भगवान (आप्तसूत्र # 792) दादा भगवान के अक्रम विज्ञान के अनुसार भाव कर्म को समझना जीवन की गुत्थी को सुलझाने जैसा है। सामान्यतः हम समझते हैं कि जो हम हाथ-पैर से क्रिया कर रहे हैं या जो शब्द बोल रहे हैं, वही कर्म है; लेकिन दादाश्री कहते हैं कि ये बाहरी क्रियाएं तो केवल 'द्रव्य कर्म' या पिछले जन्मों का 'डिस्चार्ज' (फल) हैं। असली कर्म तो वह सूक्ष्म बीज है जो क्रिया के दौरान आपके भीतर 'भाव' के रूप में पड़ता है। इसे हम 'इरादा' या 'Inner Intent' कह सकते हैं। जब हम कोई कार्य करते हैं, तो उस समय हमारे भीतर जो मान्यता होती है कि "यह मैं कर रहा हूँ", यही कर्ता-भाव नए कर्म का बीज यानी भाव कर्म है। उदाहरण के लिए, यदि कोई व्यक्ति किसी की मदद कर रहा है, तो बाहरी दुनिया को लगेगा कि वह पुण्य कमा रहा है। लेकिन यदि उस मदद के पीछे उसका आंतरिक भाव अहंकार से भरा है या दिखावे का है, तो वह उसी अनुसार भविष्य के लिए कर्म बाँध रहा है। इसके विपरीत, यदि कोई व्यक्ति मजबूरी में कोई बुरा काम कर रहा है, लेकिन भीतर से उसे उस कार्य का गहरा पछतावा है और उसका भाव शुद्ध है, तो उसका भाव कर्म उसे भविष्य में सुधार की ओर ले जाएगा। दादा भगवान स्पष्ट करते हैं कि हमारी बाहरी क्रियाएं हमारे नियंत्रण में नहीं हैं, वे तो पिछले जन्म के 'प्लान' के अनुसार ऑटोमैटिक हो रही हैं। जैसे एक बार फिल्म शूट हो जाए, तो पर्दे पर उसे केवल देखा जा सकता है, बदला नहीं जा सकता; वैसे ही यह जीवन 'द्रव्य कर्म' का प्रदर्शन मात्र है। असली शक्ति हमारे 'भाव' में है। यदि हम अपने भावों को सुधार लें, तो हम अपने भविष्य के निर्माता स्वयं बन जाते हैं। जब मनुष्य को आत्म-ज्ञान प्राप्त होता है और वह यह अनुभव करता है कि "मैं तो शुद्ध आत्मा हूँ और ये क्रियाएं तो केवल प्रकृति का हिस्सा हैं", तब वह 'कर्ता-भाव' से मुक्त हो जाता है। कर्ता-भाव छूटते ही नए भाव कर्म बनना बंद हो जाते हैं। जब नए बीज नहीं पड़ते, तो केवल पुराने फल (द्रव्य कर्म) ही शेष रह जाते हैं, जिनके पूर्ण होते ही आत्मा जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त करती है। सरल शब्दों में, भाव कर्म हमारे विचारों के पीछे छिपी वह गहरी नीयत है, जो हमारे आने वाले कल की रूपरेखा तैयार करती है। Youtube: https://youtu.be/bS0SQPDCASY?si=98Vh71un6yzC0jQj #DadaBhagwan #SelfRealization #AkramVignan #Shuddhatma #GnanVidhi #DadaBhagwanFoundation
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