जमुनाजी का सुक गया नीर, तेरे वियोगमे कान्हा ;
फिर भी कभी हुआ न तेरा व्रज में वापस आना ।
राधा वियोग में तेरे बहा न सकी आंसु, बस जी रही थी जहर पी के ;
सोच रही थी, क्या करेगी वो तुझ बिन यु, विरह में जी के !
तेरे चाहने वालों को, यूह न तड़पा ओ कान्हा,
तुझे राधा और मीरा के खातिर, वापिस पड़ेगा आना ।
करेंगे नहीं वो तेरे लिए, मुनिवरो जैसा जप तप ;
ऐ मोहन, क्यू दिखती नहीं तुझे प्रेमिजनो की यह तड़प?
वियोग सहना नहीं है आसान, जाती है वियोगिकी जान
और क्यू देखे जाता है तु ; यू बन के अंजान ???
ऐसे, प्रेमिजन को तड़पाना अच्छी बात नहीं ;
भगवान हो कर, क्या तु कर रहा है बात सही ???
Armin Dutia Motashaw