भागते-भागते उसके क़दम लड़खड़ाने लगे थे। लेकिन फिर भी अपने अस्तित्व की तलाश में भागे जा रही थी। कुछ कदम और चलने के बाद वो चीखी लेकिन उसकी चीख कोई सुन ना सका। उसी जगह पर घुटनों के बल बैठकर वो आसमान को एकटक देखने लगी और फिर उसके नयनों के बीच घिर आयी घटाओं में अश्कों की बारिश शुरू हो गयी। इस बारिश ने उसे उस कालखंड में पहुँचा दिया, जब वो घर से एक नए आसरे की तलाश में निकली थी लेकिन भेड़ियों की आँखों ने उसे इस तरह नोंचा की कपड़ों के साथ-साथ अस्तित्व के भी चिथड़े हो गए है, जिन्हें यह बहते अश्क़ अब फिर से ना जोड़ पाए।
#अस्तित्व
©दिव्य प्रकाश