मुझे क्या मालूम कितना ज़्यादा या कितना कम
इश्क़ है किसी दाल का मसाला नहीं
तुमने कहा तो छोड़ दी थी पीछे दहलीज़ तुम्हारी
पर ये बताओ के
दिल से मुझको अब तक क्यों निकाला नहीं ?
एक झुमका तुम्हारे घर भूल आयी थी
अब कह दो झूठ के तुमने उसे संभाला नहीं ?
बातें बहुत सी कहनी हैं , देखा करो कभी
मेरे होठ सिले हैं मग़र निगाहों पर कोई ताला नहीं