शहर शहर |
डगर डगर |
निकलू मे जिधऱ जिधऱ |
देखी मैंने व्यापारी, |
मानव के अंदर, |
न रही मानवता |
न रही करुणा, |
बस भूख भरी है,
पैसो की जहन के अंदर |
माँगा पानी तो पैसा माँगा |
जगा क्या मांगी बैठने की. तो,
किराया माँगा |
खाने की क्या बात करें अब उनसे |
वे खुद थे बेचारे पैसो के भूखे |
सोच रहे होंगे खुदको कामयाब |
मुख मे यु मरक मरक कर
हालत उनकी थी मेरे से बद्त्तर |
बस कपड़ो से रखी थी इज्जत ढ़ककर |
सही है !!!! तू व्यापार ही कर.. व्यापार ही कर |
इज्जत देना किसीको
नहीं है अब तेरे करम |
तू व्यापार कर.. व्यापार कर.. !!!
Alpa mehta