जब मैं कुछ लिखूंगी
तुम उसे वैसे मत पढ़ना
जैसा लिखा गया है
उसमें वो पढ़ना ,जो मुझसे
लिखते लिखते रह गया।
मेरा ज़हन और मेरा मन
एक सा होता ही नहीं
इसलिए ,बाज दफा
मेरी लिखना और लिखकर मिटाना और मिटने वाले शब्द ही कविता होते हैं
यूं ही कोई दीवाना ,कवि नहीं होता , उसे पता है आईना लिए फिरने वाले को ,हर रोज खुद की ही पहले
शक्ल देखनी पड़ती है
जब मैं अल्फाज़ दुनियां में उछालता हूं तब चोट शब्दो की सबसे पहले मुझे ही पड़ती है