कही अनकही बातें
जिंदगी जी तो सभी रहे हैं लेकिन कुछ इस तरहा से कि अपने एहम को रख और दोसरो को एहमियत न देकर
हर कोई एक दूसरे के प्रति चालाक बनकर और ये सोचकर के दुनियाँ ऐसी ही है लेकिन वो ये नहीं जानते के दुनियाँ का वजूद भी तो हमसे है अगर हम एक दुसरे को नीचा दिखाकर जीने की अभिलाषा रखते रहेंगे तो हमें शत्रुओं को ढूंढने की जरूत नहीं होगी और खुद को खतम करने के लिए न ही जहर की।
आज व्यक्तित्व पर भारी पढा लोगों का अपना एहम है वो एक तरफ ये चाहता के उसकी सारी मंसा पूरी हो और एक तरफ ये भी चाहता है कि कोई उससे आगे न निकल जाऐ।
दिन प्रतिदिन एक दुसरे के प्रति भेदभाव जैसी नीति अपना कर केवल और केवल अपने जीवन का महत्व खत्म कर रहे हैं।
आज अगर एक दूसरे के प्रति हित में विचार करते रहें तो कभी व्यक्तिगत मतभेद भाव नहीं होंगे और जीवन सरल सहज बना रहेगा।
हम अगर विचार करें एक ऐसे समाज के निर्माण के लिऐ जिसमें सिर्फ एक समान रूप से एक दूसरे को स्वीकृति मिले लेकिन बात यह कि इसकी महत्वत्ता सभी जानते है लेकिन अमन नही करते वजहा यह कि हर कोई अपने आप को बनाने में लगे हुऐ हैं और खुद को ही यह साबित करते रहते हैं कि वो सही है और समाज जिस रूप में है वह उसी रूप में स्वीकार कर लेते हैं।
मेरा मत है कि खोखले आदर्श और झूठे दिखावे से केवल और केवल अस्थिर समाजिक स्थर का निर्माण होता है और हम कभी भी समान्य रूप से अपना जीवन व्यतीत नही कर सकते।
अब जागरूक होने समय है और मैं अपनी बात लोगो तक पौहचाना चाहता हुं लेकिन लोगो के लिऐ ये कही अनकही बातें लगती जिसे वो मानना ही नही चाहते।
एक सुन्दर विचार प्रस्तुत करना चाहता हुं
" प्रकृति के सुन्दर रंग यू ही नही खिलते वो तो केवल आसपास के सभी मोलिक कणों के समान रूप से मिल जाने पर ऐसा होता है।"
व्यक्ति का दैनिक जीवन भी इसी बात पर निर्भर करता है और हमारे समाज का निर्माण भी प्राकृतिक रूप की तरहा परिवर्तित हो सकता है।
एक अंधा व्यक्ति इसलिऐ नहीं देख सकता क्योंकि वो अंधा है लेकिन उनका क्या जो अंधे नहीं हैंं फिर भी वो हर कमियों को देख कर अंदेखा करते हैं।