तुम भी ये कलाकारी सिख गए हो
उदासी को हँसी में तब्दील करना
सब कुछ ठीक न होते हुए भी कहना सब ठीक है
छिलके गाला फाड़ देने की इच्छाओ को दबा देना
शिख गए हो
अरे ज़िंदा हो तुम?
सुबह गहरी नींद से नहीं पर रात के रतजगों से भरी आँखों में भरे मेद से जागना
जैसे तैसे बस इस वक़्त को काटना
अपना आधा हिस्सा खुद से खुद को बाटना
सिख गए हो
ज़िंदा हो तुम?
नज़र में तीरगी हो
दिल में नाराज़गी हो
हारी सी बाज़ी हो
और दिल न राज़ी हो
फिर भी
चमक की सफेदी आँखों में लेकर जीना सिख गए हो
अरे ज़िंदा हो तुम?
अजब सी कलाकारी सिख गए हो
अरे ज़िंदा हो तुम?
--+☺️☺️