इतना न आज़मा ये जिन्दगी कि साँसे निकल जाए
न कर ये सितम कि अपने ही घर से बेघर हो जाए
माना इन्तहान अभी और भी हैं बाक़ी
थोड़ा तो कर्म कर कि अपनों से मिल पाए
जिन्दगी की जद्दो जेहद में छूट गया है बहुत कुछ
थम जा ज़रा कि थोड़ा सा ही सही पर कुछ तो समेट पाए
एतराज़ नही हैं मुझे तेरे सबालो से ये जिन्दगी
जबाब खोज सकूं ऐसा कोई एक मुक़ाम तो दे
कब तक भटकती रहूं रस्तो पर तलास में तेरी
तुझ तक पहुँच सकूं ऐसा कोई सुराग तो दे
- Rj krishna