इतवार की तरह है महोबत उनकी
मानते है आज , कल खुद रूठ जाते है।
अलग अंदाजे ईश्क है उनका
अपना बताते गैरो को पर हमें जताते नहीं।
शर्म समझें या अदाएं महोबात।
हाथ थामते नहीं पर जाने देते भी नहीं।
गुफ्तगुए अरमान अजब से उनके
बात करते है हमारी बस हमसे नहीं।
राबता केसे ना हो हमसे उनका
फ़िक्र करते है वो बेफेक्रे बनके।