रास्तों में थोडे थोडे अंतराल पर खडे ये लैम्पपोस्ट बीना बोले ही बहोत कुछ केह जाते हैं,
बार बार डर से आगे निकल ने को हिंमत देते है, थोडा सा उजाला देकर उन घने अंधेरों से बेफिक्र कर देते हैं ,
जब सबकुछ हार जाते हैं, तो दूरसे ही इनकी ज़रासी रौशनी फीर नई उम्मीद जगाती हैं,
वो कहेते है तु आगे बढ,उजालों के लिये मैं हूं न,
और उसीके सहारे हम फीर चल पडते हैं , उन्ही घने अंधेरों में की आगे वापस कोई लैम्पपोस्ट थोडा सा तो उजाला लिये खडा है,
बस ऐसा ही कुछ है,ज़िंदगी ऐसै ही उजलों की उम्मीद लिए इन लैम्पपोस्ट के सहारे निकल ही जाती है,और मेरे दोस्त तुम्हारा मेरी ज़िंदगी में होनाभी कुछ इसी तरहा है।
@B