ग़जल
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झुकी पलकें भी सलाम करती हैं l
आँखे ख़ामोशी से बात करती है ll
बिन खुले ही लब हज़ारों बात करती हैं l
ख़ामोशी की बात ही अलग होती है ll
बिन चले मीलो तक ग़ुम लेती है l
मन की चंचलता कहाँ कभी रुकती हैं ll
बड़े गहरे बो मन पे घाव करती हैं l
भावनायें कब कहाँ किसी की छुपती हैं ll
बो लफ़्ज़ जिनके शब्द नही होते हैं l
बो बातें अकसर हवा में सफ़र करती हैं ll
कानाफूसी बहुत देर तलक़ करती हैं l
बो तन्हाई कब ख़ामोश रहा करती हैं ll
कोरे कागज पर हर क़िस्सा सज़ा देती है l
बो कलम हर एहसास को जता देती हैं ll
- Rj krishna