अतीत की यादें:
दाँत जन्म से तो नहीं होते हैं। बाद में आते हैं और लम्बी आयु हुई तो पहले गिर जाते हैं। हमारी हँसी,मुस्कराहट को लाजवाब बनाते हैं। चेहरे को असीम सुन्दरता प्रदान करते हैं। हमारे भोजन में असीम स्वाद घोलने में सहायक होते हैं। हम उनके बारे में लम्बा नहीं सोचते हैं, लेकिन जब वे दर्द देने पर उतर आते हैं तो कहते हैं इससे बड़ा कोई दर्द नहीं, सीधे ब्रह्मांड में जा रहा है। यह ब्रह्मांड हमारे अन्दर वाला होता है। मुझे 1974 की यादें ताजा हो गयी हैं। मैंने नैनीताल में बी.एसी. में प्रवेश लिया था। नवम्बर का महिना था। ठंड अपना असर दिखाने लगी थी। मेरे दाड़ के दाँत में दर्द आरम्भ हो गया था।बचपन में उसके एक भाग में कीड़ा लगा था। दो दिन सहन करने वाला दर्द था। तीसरे दिन से उसने भयंकर रूप धारण कर लिया। अब नैनीताल का सम्पूर्ण सौन्दर्य मेरे लिए छू मंतर हो चुका था। मैं पूरा का पूरा उस दर्द में सिमट गया था। रात काटनी असंभव हो गयी थी। रजाई में दुबक कर, कभी लेटता कभी बैठता।
सुबह हुई और राजकीय अस्पताल नैनीताल पहुंच कर डाक्टर से अपने कष्ट का वर्णन किया। और कहा अब सहन नहीं होता है, इसे तोड़ दिजिये। डाक्टर ने इंजेक्शन लगाया और पूछा आधा होंठ तक बिहोश हो गया है क्या? मैंने हाँ में उत्तर दिया। शायद उन दिनों वहाँ डेंटिस्ट नहीं बैठते थे, एमबीबीएस डाक्टर ही दाँत उखाड़ते थे। डॉक्टर ने दाँत उखाड़ दिया और उस जगह को रुई से दबाकर बिहोश गाल के साथ में अपने आवास चला गया। छ-सात घंटे तक दर्द अनुभव नहीं हुआ लेकिन धीरे-धीरे अच्छा खासा दर्द होने लगा। दो दिन दवा ली और खिचड़ी खायी फिर सब कुछ पहले जैसा, हसीन अनुभूतियां होने लगीं।फिर 2013 तक किसी दाँत ने तंग नहीं किया। 2014 और 2017 में दाड़ के दो दाँत हल्का सा दर्द देकर साबूत निकल गये। एक बार डेंटिस्ट के पास गया और उनसे पूछा टूटे दाँतों की जगह बनावटी दाँत लग सकते हैं क्या? तो उसने X - रे लिया और बोली 1974 में जो दाँत तोड़ा गया है वहाँ पर लग सकता है,वहीं पर हड्डी ठीक है। मैंने कहा रहने दो,45 साल से ऐसे ही काम चल रहा है।
* महेश रौतेला