कुछ लोगों को लगता है कि वो सहन करके अपनी गरिमा को बढ़ा रहे हैं या शायद उनको यह लगता है कि चुप रहकर वो बहुत महानता का काम कर रहे हैं। इस तरह से लोगों के बीच वो लोकप्रिय रहेंगे।
दरअसल लोग अपनी कायरता और डर को सहनशीलता का नाम देकर अपना पल्ला झाड़ लेते हैं।
हम यह नहीं कह रहे कि हर बात पर प्रतिक्रिया देना चाहिए, नहीं बिल्कुल भी नहीं। लेकिन अगर बात आपके मान-सम्मान और किरदार पर आए तो आपका बोलना और विरोध करना ज़रूरी है।
हम महात्मा गांधी जी की तरह महान नहीं हैं, क्योंकि उनकी तरह बन ही नहीं सकते। इसलिए हम कुछ बातों में उनके अहिंसात्मक विचारों से इत्तेफाक ही नहीं रखते।
हमारे लिए बात सही और गलत पर तय होती है। घुमा फिरा कर बात करना हमारे बस का नहीं है।
अगर हमने कहा आप सही तो बस सही और गलत तो बस गलत। नज़रअंदाज हम भी बहुत कुछ करते हैं। लेकिन अगर बात हमारे गुरूर पर सवाल उठाए तो ये हमारी सहन शक्ति के बाहर है।
अगर आपको लगता है हम में घमंड है तो जी बिल्कुल है। क्योंकि आत्मसम्मान को दरनिकार कर झुकना हमें नहीं आता। ये पाठ ना ही हमें सिखाया गया है, और ना ही हम सीखने वाले।
ज़िद हमारी सही है, और रहेगी भी।
तो बात साफ है हम गुरूर को ज़िंदा रखेंगे, क्योंकि अगर गलत के आगे झुक गए तो हमारी ही नज़र में हमारे किरदार का बड़ा नुकसान हो जाएगा और उस परवरिश का भी जिसे देने में माता पिता की बहुत मेहनत है।
#रूपकीबातें