बलात्कार की जड़
अरे ओ क्रंदन पूर्ण कोलाहल से
आसमान सिर पर उठाने वाली
जननिओं / जनकराज
बेटों के प्रत्येक गुनाहों पर
घने आवरण का खोल चढ़ाने वाली माताओं
तुम सदा ही दोष मुक्त रही हो
तुम्हारा अन्ध प्रेम बेटों के कोरे स्लेट पर
अनजाने ही सही
मक्कारियों /चालबाजियों
क्रूरता और संवेदनहीनता
तथा गुनाहों
का पोषण करने में
कभी कोई कोताही नहीं बरती
हाँ बेटियों पर
जरूर मेहरबान रही
उन्हे दोयम दर्जे का एहसास कराकर
शोषित होने की पटकथा लिखने में
मुंशी प्रेमचंद से सदैव आगे रहीं
हो सकता है
शिकार शिकारी की पटकथा
ऊपर वाले ने लिखी हो/ पर बात हजम नहीं होती
छेड़छाड़/ बलात्कार /चोरी डकैती
और अधमरी संवेदनाओं का क्रंदन
दोषारोपण/ निन्दा
एवं आक्रोशित
बिजबिजाते समाज का स्पंदन
सत्ता की सत्ताईसा जाप पर
निशाना साधती एकान्तिक बारीकियां
जननी जनक के बोये बीजों से
तैयार वृक्षों से आँखें मूँदे
भीड़तन्त्र की विक्षिप्तता भरी चीखें
शिकारियों से शिकारियों पर
सिकन्जा कसने की फरमाइशें
क्या अटपटी नहीं लगती हैं ?
भ्रमित हम भी कम नहीं हैं ।।
कुबेर मिश्रा