साहिल पे बैठे यूँ सोचता हूँ आज,
कौन ज़्यादा मजबूर है..!
ये किनारा, जो चल नहीं सकता,
या वो लहर, जो ठहर नहीं सकती..!
मैं लोगों से मुलाक़ातों के लम्हे याद रखता हूँ
मैं बातें भूल भी जाऊ तो लहजे याद रखता हूँ।
जरा सा हट के चलता हूँ, ज़माने की रिवाज से
जो सहारा देते हैं वो कंधे हमेशा याद रखता हूँ
दूसरों की सुनेंगे तो मुझे बुरा ही पाऐंगे,
अगर खुद मुझसे मिलेंगे तो वादा रहा,
मुस्कराकर ही जाऐंगे।