Hindi Quote in Story by Kuber Mishra

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हिम उपत्यका फटिक शिला तरु
आरोपित ऊष्मा प्रगती
पथिक बटोही दिव्य पुरुष वह
माया प्रति छाया जगती

चेतनता की दिव्य रश्मि
उन्मुक्त तरंगों का संचार
देख रहा था क्षितिज छोर तक
शुभ्र चाँदनी सा विस्तार

चटक रही अवरोध शृंखला
बिखर रहे संघात विहंग
उमग रही चंचल धाराएँ
झर झर झरे प्रपात मृदंग

उषाकाल की प्रथम ख्याति सी
मचल रही ऊर्जस्वित रेख
मधुर सृष्टि वीणा रव पूरित
सर्व नियन्ता लिपि आलेख

प्रलयंकर वह महाकाल था
सदियों बाद हुआ चैतन्य
मृत्युञ्जय वह अविनाशी था
रुद्र उपस्थिति वसुधा धन्य

वही शिखर था वही दिशायें
वही सरोवर तट था शान्त
हृदय उठ रहीं मधुरिम यादें
प्रथम पुरुष अनियन्त्रण भ्रान्त

वह पहला सम्मोहक खिंचाव
कैसा आकर्षण था विचित्र
स्पंदित होता धड़कन बनकर
कालजयी वह अमर चित्र

वंकिम नयनों के कोरों से
भौहों का सर संधान देख
वह जल तरंग मुस्कान
हृदय पर खिंची हुयी पाषाण रेख

चित्त भित्ति पर अमिट छाप
अरुणिम अधरों की कोमलता
करती इंदीवर पंक्ति हास
रतनार नयन की चंचलता

कैसी थी अनुभूति सुकोमल
भावों का अनुपम उत्कर्ष
प्रस्तर पर खींची लकीर
वह पहला आलिंगन स्पर्श

देव कामिनी ज्यों नयनों से
झरत मनो मधु मदिर समीर
मांसल किरणों से स्पंदित
लक्ष्य बेधते रति पति तीर

विद्यमान थी सती हृदय में
दृश्य लोक से थी अब दूर
सहज रूप अवलोकन करती
दृष्टि त्रिशूल रही थी घूर

धरती पर विनाश का साथी
खड़ा समेटे जग इतिहास
रुद्र चल पड़ा प्रमुदित मन फिर
अधर समेटे नव मृदु हास

इस जग से अब गुप्त रखेगा
अपनी शक्ति रुद्र का नाम
रहकर साधारण मानव ही
भ्रमण करेगा वह निष्काम

शक्ति नियन्त्रित सदा रखेगा
आयें कठिन विकट पथ मोड़
दर्शक ही अब मात्र रहेगा
चला सहज मन पर्वत छोड़

मृत्युञ्जय से----

Kuber Mishra
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Hindi Story by Kuber Mishra : 111213720
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