मौत का घोल
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बाल वृद्ध तरुणी तरुण, युवा नृपति कंगाल।
माटी तन फेंटे गये, मृत्यु बुने जब जाल।।1
जीव सरीसृप जिन्दगी, नियति बजाती बीन।
काल गँड़ासा चक्रिका, चारा काट मशीन।।2
प्रेम कर्ज वापस करे, लोभ दिवाला चाल।
वृक्ष छँटाई कर्म की, भाग्य मार असि काल।। 3
लिया जगत की बैंक से, प्रेम घृणा जो कर्ज।
वही उपस्थित पास में, मीठा कड़वा मर्ज।।4
घृणा प्रेम जितना दिया,अपयश मान विकार।
केर बेर तरु बेल जिमि, कुड़की व्याज उधार।।5
जितना जिससे नियत है, बुद्धि बदन संपर्क।
पल-पल पर मौजूद हैं, छल बल तर्क-वितर्क।।6
व्यर्थ संचना किस लिए, घृणा द्वेष संताप।
प्रेम लुटाना पुण्य पथ, छीनी सुविधा पाप।।7
भूत गोद में बैठकर, नहि भविष्य सोपान।
काल रेल छोड़े कहाँ? वर्तमान रख ध्यान।।8
बदन अतीत न रुक सके, खींचें जीवन काल।
दिव्य चेतना पर पड़ा, काम कामना जाल।।9
अगला चयनित हर बदन, मृत्यु कड़ाही घोट।
फिर लौटा देगी वही, बदल अनेकों नोट।।10
कुबेर मिश्र