खुसरो दरिया प्रेम का ,बाक़ी उल्टी धार
जो उबरा सो डूब गया, जो डूबा सो पार
अमीर खुसरो के इस दोहे से कबीर सिंह की शुरुआत होती है,
फ़िल्म के अनुसार कबीर एक ऐसा लड़का है जो सिर्फ फिल्मों में ही देखा जा सकेगा, क्योंकि शराबी, टॉपर, लड़ाकू, पुरुषवादी सोच का एक साथ सम्मिश्रण यथार्थ में मिलना मुश्किल है। और यदि कोई ऐसा है तो मेरे व्यक्तिगत दृष्टिकोण में उसका अस्तित्व इस पृथ्वी के लिए एक कलंक है।
फ़िल्म में एक सीन आता है, जब कबीर ,प्रीति के आने के अगले दिन उसके गालों पर जाकर किस करता है, बिना उसकी अनुमति, ऐसे जैसे अधिकार हो, ओर अधिकार भी इसीलिये क्योंकि उसे भरोसा है कि उसको मना नही किया जाएगा, ओर ये भरोसा जन्म कहाँ से लेता है, समाज की उस मानसिकता से, जिसमें महिलाओं की वस्तुपरकता अभी भी जीवंत है। अभी भी एक अमीर, सुंदर(पैमाने नही पता), उच्श्रृंखल व्यक्ति को जैसे अधिकार सा मिल जाता है, की वह कुछ भी कर सकता है। इस पूरी फिल्म में प्रीति को एक ऐसी लडक़ी के रूप में दिखाया गया है, जिसके वस्त्र पहनने के तरीके से लेकर दोस्त को चुनने तक का अधिकार उसके कथित प्रेमी को मिल जाता है। चाहे होली पर रंग लगाने की बात हो अथवा ये घोषणा करना कि वो मेरी बंदी है, इन सबके द्वारा सिनेमाई माध्यम से स्त्री की वस्तुपरकता को सिद्ध करने की कोशिश की जाती है, नारीवाद, स्त्री समानता से जैसर किसी का कोई सरोकार ही ना हो, बल प्रयोग द्वारा किसी से संबंध स्थापित करना, ये दिखाकर क्या बलात्कारिक मानसिकता को नही बढ़ाया जाता है, बिल्कुल, क्योंकि सिनेमा से हम बहुत कुछ सीखते है, ओर तक़लीफ़ तब ओर ज्यादा हो जाती है जब, भीड़ इन सारे दृश्यों पर तालियां पीटती है। इसके अतिरिक्त प्रेम जैसी भावना का परिणाम ज़िन्दगी को बर्बाद करने के रूप में दिखाए जाने के पक्ष में भी व्यक्ति को खड़ा दिखाया जाना प्रेम का अपमान है। प्रेम की व्यापकता ओर उसकी सम्भाव्यताओं को ये फ़िल्म छू भी नही पाई।
हम इसे तेरे नाम 2 भी कह सकते है,बस कुछ प्रारूप परिवर्तित हो गया है। एक ओर बात यदि आप तर्कशील है तो ये फ़िल्म आपके लिए नही है, इस पूरी फ़िल्म में एक ऐसा दृश्य ढूढ़ना मुश्किल है जिसमे कोई तर्क हो, साधारण शब्दों में अतार्किक फ़िल्म!
इस घटिया मानसिकता के बाद भी अंत में कबीर सिंह ऐसे लगता है जैसे कि इसे प्रेरणा के रूप में देखा जाना चाहिए। ज़बरदस्ती घृणित व्यक्तित्व को हीरो के किरदार में लाकर उसके कृत्यों को सामान्य करने की कोशिश की जाती है, ताकि आप हीरोऔर यदि आप तटस्थ नही है तब तो कबीर सिंह आपके लिये प्रेरणा बन ही जायेगा।
अंततः सिर्फ यही कहना है कि अगर हम सिनेमा को समाज को प्रभावित करने वाले अस्त्र के रूप में देखते है तो उनमें कबीर सिंह जैसी फ़िल्म का प्रयोग वर्जित होना चाहिए। हाँ अगर कुछ सकारात्मक है तो सिर्फ इतना कि आप इससे ये सीख सकेंगे कि जीवन में क्या नही करना है। धन्यवाद
"अंकित-शब्द-समर"
नोट-लेखक के व्यतिगत विचार है।