भगवत् गीता संगीत
योगेश्वर श्रीकृष्ण का, दिव्य अलौकिक ज्ञान।
प्रथम सत्र अध्याय अथ, जीवन तत्व विधान।।
कुरुक्षेत्र धर्म भूमि, युद्धमत्त कामना।
पाण्डु पुत्र मम सुपुत्र, हो रहा है सामना।।
दिव्य दृष्टि प्राप्त तुम, बता हमें हे संजया।
भीष्म द्रोण कर्ण वीर, कृष्ण और धनन्जया।।
पाण्डु पुत्र सैन्य व्यूह, देखकर सुयोधना।
भूप पुत्र बढ़ चला है, द्रोण गुरु प्रबोधना।।
विशाल सैन्य पाण्डु पुत्र, देखिए गुरू प्रवर।
आप शिष्य द्रुपद पुत्र, कौशले परम प्रखर।।
धृष्टकेतु चेकितान, काशिराज वीर्यवान।
कुन्तिभोज शैब्य श्रेष्ठ, द्रुपद पुत्र धैर्यवान।।
युधामन्यु उत्तमौज, युयूधान तेजवान।
द्रोपदी सुभद्र पुत्र, पृथा पुत्र के समान।।
स्वयं का पक्ष देखिए, महाबली जो शूर वीर।
भीष्म कर्ण कृपाचार्य, सौमदत्त पुत्र धीर।।
भवान् सुत विकर्ण धीर, आप हैं डटे हुये।
सदा विजित महान, शूरवीर हैं पटे हुये।।
विश्व की महान सैन्य, भीष्म बाहु रक्षिता।
टिक सकेगी कब तलक, वो भीम हस्त दक्षता?
सभी सुनेंगे ध्यान से, मैं भूप सुत दुर्योधना।
शत्रु को पछाड़ कर, विजित हमारी योजना।।
इसीलिए करें सबल, प्रवीर भीष्म कन्ध को।
करो तहस-नहस सुवीर, भीम के प्रबन्ध को।।
युद्ध घोष शंख गूँज, भीष्म सिंह गर्जना।
प्रचण्ड घन निनाद, घोर अस्त्र-शस्त्र मर्जना।।
कृष्ण घोष पाञ्चजन्य, देवदत धनन्जया।
पौन्ड्र शंख भीम घोष, जय-विजय पराजया।।
शंखनाद हो गया, घृणा की अग्नि ज्वाल का।
खुल गया असीम का, कराल गाल काल का।।
अट्टहास कर उठी है, मृत्यु शीश-शीश पर।
काल का बिगुल बजा, अधर्म-धर्म शीश पर।।
सिहर उठीं दसों दिशा, दहाड़ शंखनाद से।
तो पार्थ ने कहे वचन, तभी जगत के नाथ से।।
युद्ध भूमि मध्य रथ को, ले चलो हे केशवा।
देखना है आज वह, स्वजन का शत्रु वेषवा।।
सुन के पार्थ का वचन, बढ़ा है कृष्ण स्यंदना।
युद्ध भूमि मध्य रथ, खड़ा किया जनार्दना।।
पुत्र पौत्र मित्र भ्रात, द्रोण गुरु पितामहा।
लहू बहाने के लिए, डटे प्रवीर सब वहाँ।।
गाण्डीव गिर रहा है, जल रही त्वचा मेरी।
काँपते हैं अंग-अंग, छिल रही जुबाँ हरी।।
रोंगटे खड़े हुये हैं, देख युद्ध तात भ्रात।
खेलना स्वजन लहू से, हो रहे शिथिल हैं गात।।
क्या करेंगे वह विजय, स्वजन के शीश काटकर।
सुख मिलेगा कौन सा, स्वयं का अंग बाँटकर।।
स्वजन को मार कर नहीं, है स्वर्ग सुख की कामना।
गुरु पितामहा पे अब, कठिन है शस्त्र तानना।।
असंख्य मृत्युओं का, पाप लूँ भला मैं किस तरह।
क्यों बनूँ बधिक, जमीन के लिए मैं इस तरह?
दोष कुल के क्षय का है, वैधव्य की विशालता।
नारि दोष में पड़ेगी, काल की करालता।।
अवांछितों के जन्म से, महान पाप सर्जना।
तो पिण्ड दान पितर धर्म, नष्ट सब जनार्दना।।
विनाश कुल का जो करे, सुना है गुरु परंपरा।
सदैव नर्क भोगता, जगत गुरुम् धुरन्धरा।।
राज्य सुख को भोगना, नहीं है कामना मुझे।
अधर्म लग रहा है देव, शस्त्र थामना मुझे।।
ज्येष्ठ तात पुत्र सब, भले ही मुझको मार दें।
या कि मुझ निशस्त्र पे, वे अस्त्र-शस्त्र वार दें?
मैं नहीं करूँगा युद्ध, मित्र देव केशवा।
शस्त्र त्याग युद्ध भूमि, शोक ग्रस्त वेठवा।।
संजय बता रहा था, प्राप्त दिव्य दृष्टि से।
पार्थ युद्ध से विरत, विमोह सृष्टि चक्र से।।
प्रथम सत्र संपन्न इति, भगवत् गीता गीत।
काव्य अनुवाद कुबेर का, व्यास कृष्ण संगीत।।1
Kuber Mishra
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