" झाँसी की रानी” कविता –
सिंहासन हिल उठे राजवंषों ने भृकुटी तनी थी,
बूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थी,
गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी,
दूर फिरंगी को करने की सब ने मन में ठनी थी।
चमक उठी सन सत्तावन में, यह तलवार पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी।
“झाँसी की रानी” कविता की इन पंक्तियों में मशहूर कवियित्री सुभद्रा कुमारी जी ने झांसी की रानी की वीरता के बारे में बताया है कि , किस तरह उन्होंने गुलाम भारत को आजाद करवाने की चिंगारी हर भारतीय के मन में लगा दी थी और अंग्रेजों के अत्याचारों के खिलाफ आवाज उठाने का साहस भारतीयों के अंदर भरा था, जिससे सभी भारतीयों ने भारत से अंग्रेजों को भगाने का निश्चय किया और आजाद भारत में रहने की इच्छा जगाई थी।