मै पृथ्वी जल और अग्नि से रहित स्वप्रकाशमय परब्रह्म हू, मै वायु और आकाश से विलक्षण ज्योर्तिमय परब्रह्म हू । मै कारण और करण से पृथक ज्योर्तिमय परब्रह्म हू मै विश्व रूप से विलक्षण ज्योर्तिमय ब्रम्ह हू मेरे न हाथ है न पैर है नगुदा है नमुख है नाक कान त्वचा नेत्र जिह्वा और शरीर हीन ज्योर्तिमय परब्रह्म हू रूप रस शव्द स्पर्श से रहित हू चित अहंकार से हीन प्राण अपान से रहित व्यान उदान से अलग जरा मृत्यु से मुक्त शोक मोह लोभ से पृथक भूख प्यास से हीन स्वप्न जाग्रत अवस्था से भिन्न अंधकार और तैजस से भिन्न मै मान अपमान से परे शुद्ध ज्योर्तिमय परब्रह्म हू ।
मै नित्य शुद्ध बुद्ध सत्य मुक्त आन्नद और अद्वैतरूप ब्रम्ह हू मै विग्यान रूप ब्रम्ह हू मै सर्वथा मुक्त और प्रणव स्वरूप हू और मोक्ष देने वाला समाधि रूप परमात्मा भी मै हू रे मूर्ख तू सदा इसी भाव का चिंतन करो यही परमतत्व है यही उत्कृष्ट ग्यान है जो इसका चितन करता है वही मुक्त है वही योगी है और वही ईश्वर को जानने वाला है ।
जगत जननी मा राधा रानी एवं जगद्गुरु श्री कृष्ण जी के चरणारविन्दो मे हृदय सदा ही रमता रहे मेरी प्रत्येक सासो मे बस केवल आपका ही नाम हो हे मुरली धर कन्हैया आप की रूप माधुरी का मै साधनारत रहकर सदा ही पान करता रहू रात और दिन माह और वर्ष सब व्यतीत होते रहे लेकिन मेरा हृदय आपमे ही समाया रहे यही हृदय की कामना है ।
अलबेली सखी के चरणन मे
नित श्रद्धा के फूल चढाता रहू
अपने सरकार सलोने जू है
बस गीत श्याम के ही गाता रहू ।।
यही मंगल कामना है यही प्रभू से प्रार्थना है