हृदय परिवर्तन
नर्मदा नदी के किनारे एक संत करते थे। उनके आश्रम के बगल में ही एक कसाई रहता था जिसकी नीयत स्वामी जी के आश्रम की जमीन हडपने की थी। वह चाहता था कि स्वामी जी किसी प्रकार से यहाँ से चले जाये और वह जमीन पर कब्जा कर ले। अपनी इच्छा की पूर्ति के लिए वह प्रतिदिन एक मुर्गी को मारकर उसकी हड्डियाँ, आश्रम के मुख्य द्वार के पास फेंक आता था इससे वहाँ पर बदबू फैलने के कारण स्वामी जी एवं आश्रम में आने जाने वाले उनके अनुयायियों को काफी कष्ट होता था। यह जानकर वह कसाई मन ही मन प्रसन्न हुआ करता था। उसके विचित्र स्वभाव के कारण उसकी पत्नी और उसका बेटा उसके छोडकर अन्यत्र निवास करते थे।
कुछ माह के पश्चात शहर में प्लेग नामक बीमारी का प्रकोप अचानक फैल गया। शहर में रहने वाले लोग इसके प्रकोप से बचने हेतु शहर छोडकर बाहर जाने लगे। इसी दौरान वह कसाई भी इस बीमारी की चपेट में आ गया। उसकी पत्नी और बेटा पहले ही शहर छोडकर जा चुके थे। स्वामी जी ने ऐसी विकट परिस्थितियों में उसकी बहुत सेवा की जिससे अभिभूत होकर उसने एक दिन स्वामी जी से पूछा कि मै तो आपका अहित चाहता था और आपके आश्रम की जमीन हडपना चाहता था। मेरे इतने दुर्भावना पूर्ण व्यवहार के बाद भी आप इतने तन, मन से मेरी सेवा कर रहे है। ऐसा क्यों ?
स्वामी जी ने मुस्कुराते हुए कहा कि मानव में मानवीयता के साथ मानव की सेवा करने की मन में भावना एवं उसे कार्यरूप में परिणित करना ही वास्तविक धर्म है। मैंने केवल अपने कर्तव्य का पालन किया है। यह सुनकर वह कसाई स्वामी जी के चरणों में गिरकर अपने द्वारा किये गये पूर्व कृत्यों के लिए माफी माँगता है। स्वामी जी की बातों से उसका हृदय परिवर्तन हो चुका था। उसने अपनी जमीन भी आश्रम को दान देकर स्वयं उनका शिष्य बनकर सेवा का संकल्प ले लिया। इससे हमें यह शिक्षा प्राप्त होती है कि निस्वार्थ सेवा के द्वारा कठोर व्यक्ति का भी हृदय परिवर्तन हो सकता है।