मेरा दिल मुझसे और मैं दिल से उलझता रहा रात भर,
तेज़ तूफान में शमा की तरह जलता बुझता रहा रात भर।
क्या खोया क्या पाया मैंने वो रात के उस अंतिम पहर में,
बिना कुछ समझे अजीब सा हिसाब करता रहा रात भर।
इतना कुछ सोचा था उस महेरबान से कहना था आज,
अपनी सुना कर चली गयी, मैं यूं ही तरसता रहा रात भर।
तूफान बहुत से आये और गुज़र गये ज़िन्दगी के सफर में,
क्यों ये कसक अनजान मेरे दिल को जलाता रहा रात भर।
ग़म हो या कोई दर्द हो, आँसू बहाने की आदत न थी,
न चाहते हुए भी रुक रुक कर मैं बरसता रहा रात भर।
जाने कौन सा भरम टूट गया इस ख्वाबों के नगर में मेरा,
अंदर के डर से "पागल" पल पल जीता मरता रहा रात भर।
✍?"पागल"✍?