यूँ तो हम एक दूसरे को नाम से जानते थे, मिले भी थे, लेकिन उस मुलाकात में कभी बात नहीं हुई। वो महज़ नज़र का मिलना भी क्या मिलना होता है। फिर जब बहुत वक़्त बाद मैं तुम्हारे सामने थी तो हम अकेले थे, तुम्हें देखे बिना ही समझ चुकी थी तुम मेरे सामने हो। और ये भी की तुम मुझे देख रहे हो। लेकिन मैंने तुम्हें नहीं देखा, यूँ नज़र उठाकर तो नहीं। उस कमरे से दूसरे कमरे तक का सफर बहुत लम्बा था। जिसे तय करना खुद को उस स्थिति से बचाना था जो तुमसे नज़र मिलने पर बनती।
लेकिन मैं जितना कोशिश करती की मेरा तुमसे आमना सामना ना हो, उतना ही ज़्यादा होता था। और शायद इस कोशिश में तुम भी थे।
बहुत बार ऐसा हुआ जब हम टकराने वाले थे, लेकिन मेरे हाथों ने तुम्हें इतना करीब आने से रोक दिया, इसे मेरी किस्मत ही समझ लो।
बहुत बार मैं गिरने वाली थी और जानती थी तुम ही संभालोगे, लेकिन खुद ही संभल जाती। इसमें लगी मेरी कोशिश मुझे ही पता है।
कुछ चंद बातें हुई हैं अपनी लेकिन औपचारिकता से भरी।
तुमने कभी नहीं कहा कि तुम मुझसे मोहब्बत करते हो,
और ना तुमने कभी कोई कोशिश की..
लेकिन ये जो महज़ कुछ घटनाएं होती थी ये हमें उस परिस्थिति में सामने ले आती थीं जिनमें मैं आना नहीं चाहती थी शायद इसकी वजह मेरा बातों से बचना है या मेरा अंतर्मुखी स्वभाव है।
सच कहूँ तो मुझे तुम्हारी भावनाओं के बारे में नहीं पता।
लेकिन एक सच ये भी है कि महज़ तुम्हारी नज़र मुझ पर होने से मैं तुरन्त वहां से चली जाना चाहती थी क्योंकि तुमसे नज़र नहीं मिला पाती थी। और तुम मुझे देखते भी तब थे जब कोई आस पास नहीं होता था, या जब सब व्यस्त होते थे।
तुमने बात भी मुझसे तब की जब कोई नहीं होता था। और कभी कभी तो अकेले में भी बात नहीं हुई, केवल हम मुस्कुरा देते थे या वो भी नहीं।
मुझे समझ नहीं आता यह सब क्या है..
मैं जानना चाहती हूँ तुम्हारी मौजूदगी मेरे लिए इतना भारी क्यों होती है?
मैं जानना चाहती हूँ तुम्हारे मुझे देखने से मैं असहज क्यों हो जाती हूँ?
मैं जानना चाहती हूँ तुमसे बात करते वक़्त मेरी आवाज़ क्यों कांपती है?
मैं जानना चाहती हूँ तुम्हारी आंखें और तुम्हारी बातें दोनों मिलती क्यों नहीं?
मैं जानना चाहती हूँ उस दिन तुम सारी जगह छोड़ कर मेरे पीछे ही क्यों बैठे थे?
मैं जानना चाहती हूँ मैं किसी से भी बात करूं, तुम क्यों मेरी बात को सुनने के लिए रुक जाते हो?
मैं जानना चाहती हूँ ये सब क्यों?