मिट्टी
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मिट्टी हूँ, मैं मिट्टी
मैं निस दिन,
रौंदी जाती हूँ,
कभी पहाड़ पर,
कभी मैदान पर,
निस कुचली जाती हूँ,
पर यह भी सच है,
इन्ही जगहों पर,
मैं निस दिन,
फूल खिलाती हूँ,
मिट्टी हूँ, मैं मिट्टी,
मैं निस दिन,
रौंदी जाती हूँ,
कभी दरियांँ पर,
कभी नदियां पर,
निस दिन कुचली जाती हूँ,
पर यह भी सच है,
इन्ही जगहों पर,
मै निस दिन,
घरौंदे बनाती हूँ,
मिट्टी हूँ, मैं मिट्टी,
निस दिन रौंदी जाती हूँ,
कभी गलियों पर,
कभी सड़कों पर,
निस दिन कुचली जाती हूँ,
पर ये भी सच है,
इन्ही जगहों पर,
मैं निस दिन,
सुंदर राह बनाती हूँ
मिट्टी हूँ, मैं मिट्टी,
मैं निस दिन रौंदी जाती हूँ,
कभी बाग में,
कभी खेत में,
निस दिन कुचली जाती हूँ,
पर ये भी सच है,
इन्हीं जगहों पर.
मैं निस दिन,
फल उगाती हूँ,
मिट्टी हूँ, मैं मिट्टी,
मैं निस दिन रौंदी जाती हूँ,
मेरा कण कण,
उगाए सोना,
मानव तू न,
इसको खोना,
बस इतना है,
मेरा कहना,
मुझको उस पथ,
फैक देना,
जहाँ से गुजरे,
हिन्द की सेना,
तो मैं भी बड़ी कहलाउंगी,
वीर - भूमि की मिट्टी कहलाउंगी।
Uma vaishnav
मौलिक और स्वरचित