मैं शान्ति के लिए नित्य,
आकाश को अनेक बार देखता हूँ,
कभी धूप तो कभी मेघ चाहता हूँ।
सामने वृक्ष को दो-चार बार देखता हूँ,
कभी फूल तो कभी छाया को ध्यान में रखता हूँ।
पक्षियों को बार-बार निहारता हूँ,
कहीं उड़ान तो कहीं विराम पाता हूँ।
मन्दिर की घंटियां सुनता हूँ,
नदी की कल-कल ढ़ूंढता हूँ
पहाड़ के शिखर खोजता हूँ,
रास्तों की मुस्कराहट याद करता हूँ,
घर के बारे में सोचता हूँ,
यात्राओं को बहुत बड़ा बनाता हूँ।
**महेश रौतेला