एक बार
आज चंद्रमा बादलों से झांक रहा था खिल के सोलह शृंगार;
देखती रही उसकी खूबसूरती मै, बार बार लगातार ।
देखकर उसे, आपकी याद आ गई मुझे; दिल धड़कने लगा, बजने लगी सितार;
काश आप भी आ जाते; पुकार रहा है आप को मेरा प्यार ।
हर माह जगाता है चंद्रमा एक नई आश, दिल हो जाता है बेकरार;
ऐसी भी क्या उम्मीद, की होंगे जरूर दर्शन आपके मौत से पहले एक बार
आई और गई कितनी पूर्णिमाएं पर अमावस अब तक गई नहीं एक भी बार;
जो भी हो, पर अब तक, मानी नहीं है मैंने भी हार ।
आपको शायद तरस आ जाए हम पर भी, कभी कभार ।
Armin Dutia Motashaw