किस्म किस्म के दर्द दिए
तूने मेरे ऐ गुज़रे वक़्त
लेकिन सलामत, मेरा हौसला
मेरी हिम्मत है
आज भी जिंदा हूं
आबाद हूं
शायद इसमें भी तेरी रजा
तेरी ही रहमत है।
कभी माकूल हुआ तू
कभी हुआ बेमुरव्वत
दिखाया तूने कभी आइना
कभी बिना आइने के सूरत
राहों से नापा तूने
कभी मंजिलों से तोला
आजमाया तूने मुझे
जब जैसी थी जरूरत।
खुदको साबित कर पाऊं,
ये तूने ही तो चाहा था
तेरी साजिशों में भी,
एक फ़रमान था मेरी खातिर
अफसानों के महल में,
जो तूने ख़ुद को छुपाया था
भला मेरा छुपा था उनमें,
जो चाल थी तेरी शातिर।